रविवार, 16 अगस्त 2015

तुम से हम रूठकर अब किधर जायेंगे - डॉ. मुकेश पाण्डेय

तुम से हम रूठकर अब किधर जायेंगे
ग़म में डूबे रहेंगे या मर जायेंगे
अब तो भाता नहीं ये विरानापन
अब तो साये से भी हम डर जायेंगे


वस्ल की आरज़ू अपने दिल में लिए
जबकि अपना तुम्हे हम बना ही लिए
ये दिल मेरा तड़प रहा एक ज़माने से
आ भी जाओ सनम तुम बहाने से
मैं मिलूंगा वहां वो जिधर जायेंगे


जिन्दगी इस जहाँ की फ़क़त चार दिन
कैसे बीतेगी रातें सनम तेरे बिन
काट कर मांगते हैं वो बाजु मेरा
फ़िर भी वो कहते नहीं तुम हो मेरा
उनके कदमो में लेके हम सर जायेंगे


है तकलीफ़ मुझे अब ज़माने से क्या
ज़िन्दगी तेरे कदमो में आने से क्या
कर दिया हालत ने रुस्वा बहुत
आदमी था बात का सच्चा बहुत
देखके तुझ को हम लड़खड़ा जायेंगे

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