शनिवार, 15 अगस्त 2015

मातम है या शादी है - डॉ. मुकेश पाण्डेय

मातम है या शादी है 
मय्यत पूंजीवादी है 

बातें सब बारीक़ महीन 
तन पर मोटी खादी है 

जनता चुप है संसद मौन 
आखिर कौन फसादी है

पंच  बना जो दुनिया का 
जंग उसी ने लादी है 

आती जाती सांसों को 
हर पल एक मुनादी है 

जीवन है हदबंदी में 
मरने की आजादी है 

ऐसा है जनतंत्र यहाँ 
जनता ही फ़रियादी है 

ग़ज़लें गीत कहानी छोड़ 
वक़्त की ये बर्बादी है 

उसको इज़्ज़त देगा कौन 
जिल्ल्त का जो आदि है 

शेर सुनाता रहता है 
मुकेश" भी बकवादी है 

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