शनिवार, 15 अगस्त 2015

उनके बख्शे हुवे दर्द में लज़्ज़त न रही -डॉ. मुकेश पाण्डेय

उनके बख्शे हुवे दर्द में लज़्ज़त न रही 
चैन से जीने की फिर कोई भी सूरत न रही 

ख़ून-ए -दिल  दिल पी  के गुज़र करनी पड़ी फिर हमको 
हमसे जब साक़िए -महफ़िल को मुरव्वत न रही 

तेरे जलवों की तजल्ली का तो क्या कहना मगर 
अपने दिल में ही वो जज़्बात ,वो  हिम्मत न रही 

कैसे दुनिया में मज़े लुटे कोई ज़न्नत के 
जबकि तक़दीर में वो ऐश ,वो इशरत न रही 

इक नज़र देख उन्हें भी तू ,ज़रा ऐ साक़ी 
जाम के रहते जिन्हे पीने  की हसरत न रही 

क्या सुने किससे  सुने किसकी कहानी आख़िर 
शैखो -ब्रह्मन की भी जब दहर में इज़्ज़त न रही 

जुल्फ की ख़ुश्बू उड़ा दी है हवा में ,क्या तूने 
किसलिए फूल में वो रंग ,वो नकहत  न रही 

पीरे मयख़ाना पिलाता रहा इस पहलु से 
तौबा करने की किसी रिन्द  को फुर्सत न रही 

ख़ून करना पड़ा अरमानों का हमको मुकेश" 
जब भरी बज़्म में,साक़ी की इनायत न रही 













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