हम जिस घडी इस मुर्शद ए कामिल से आ मिले
कश्ती में इसकी बैठ के साहिल से आ मिले
गुमराह मुसाफिर थे ठिकाना न था कोई
रहबर के कदम थाम के मंज़िल से आ मिले
मुर्शद की बात मान के गैरों को जिस घड़ी
अपना बना लिया तो दिल दिल से आ मिले
जिसने सुकून ओ चैन मुकेश " तुझको दे दिया
जग छोड़ के इस साहिबे हासिल से आ मिले
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