ओझा जी कहेले की धईले बिया मढ़ी
हे थावे वाली अब रउरे कुछु करी
सईयां ला हम त भाड़ा भखले बानी
कलशा दशहरा में हम रखले बानी
कहीं रउरा पूजा में का आख़िर चढ़ी ?
हे थावे वाली अब रउरे कुछु करी
जिनगी के शान हमार हउवें सजनवा
पूजत रहेब माई राउर चरनवा
क़िस्मत में हमरा रउरे रंग भरीं
हे थावे वाली अब रउरे कुछु करी
पाण्डेय मुकेश" हमसे बोलत नाहीं
बाड़े भकुआइल आँख खोलस नाही
हमरा त लागल बाटे थरथरी
हे थावे वाली अब रउरे कुछु करी
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