शनिवार, 15 अगस्त 2015

क्षीर नीर भेदक सदा ही जहाँ वाहन है- डॉ. मुकेश पाण्डेय

क्षीर नीर भेदक सदा ही जहाँ वाहन  है
ज्ञान की प्रवाहित अखंड जहाँ धारा  है  

ग्रंथो से ही ज्ञान-ग्रंथियों को जहाँ दूर कर 
विश्व में प्रकाश ही प्रकाश को प्रसारा  है 

वीणा के स्वरों में सब ताप  दाप धूल जाते 
श्वास श्वास में ही तव स्वर को उचारा है 

मातु शारदा से हुआ वेदों का विकास 
जिसे विधि ने पढ़ा तो चतुरानन पुकारा है 

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