रविवार, 27 सितंबर 2015

तुमको चाहा कितना -कितना मैंने अपनी चाह में - डॉ मुकेश पाण्डेय

तुमको चाहा कितना -कितना मैंने अपनी चाह में 
सुरुजमुखी खेत में झूमे ,फसलें खड़ी गवाह में 

रुकता नहीं प्यार ,प्यार यह , नदी , झील-पर्वत सा 
मीठा-मीठा लगे रात-दिन ,शहद घुले शर्बत सा 
लाज का गहना पहने तेरी ,आँखे बसी निग़ाह में 


इन हाथों से रची रोटियाँ ,प्यारी पकवानो सी 
लहू उगाती क्षण-क्षण मुझमें ममता वरदानों सी 
धुप हवा पानी इस घर में घूमें भली सलाह में 


अबके काट रहा जब मैं ख़ुद अपने हाथों फ़सलें 
परस तुम्हारे हाथों का भी कहता मिलकर हँसले 
पीला फूल कनेर इक ,खिलता है दिन माह में 

maaee aas ba tohar


जब देहियां गरमाला - डॉ मुकेश पाण्डेय

जब देहियां गरमाला बिछाके बोरा सुतावे  भुईयां रे 
पटे पलट के डॉक्टर बलमुआ घोंप देला सुईया रे 

जबसे गवनवा गईनी हम ,आफत हजार पवनी हम 
केतना बताईं देहिया पर केतना आख़िर सहनी हम 
जब जिउवा घबराला उठाके गोदी ले जाला गुइयाँ रे 

मनवा मोर करे नाहीं नहिरा छोड़ के ससुरा जाईं 
कईसे आपन दुखवा ई ,अपना बलम के समझाईं 
किल्ली लगाके दियवा बुताके पटे करे पेटकुईंया रे 

शनिवार, 26 सितंबर 2015

वो किसी रोज़ समंदर भी बना ही लेगा - डॉ मुकेश पाण्डेय

वो किसी रोज़ समंदर भी बना ही लेगा 
जो मिला सकता है दरियाओं को 

Woh Kisi Roz Smndar Bhi Bna hi Lega 
Jo Mila Sakta Hai Driyaon ko 

وہ  کسی روز سمندر بھی بنا ہی لگا 
جو ملا سکتا ہے دریاؤں کو 

शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

जैसे प्यार के आवेश में कोई लड़की - डॉ मुकेश पाण्डेय

हम तो क्या हैं फ़क्त वक़्त के गुलदस्ते हैं 
जैसे कोई इनको सजाये फिर उसे तोड़ दे 
जैसे प्यार के आवेश में कोई लड़की 
किसी बच्चे को जन्म दे फिर उसे तोड़ दे 

गुरुवार, 24 सितंबर 2015

शीश उतारी जो हाथ धरे - डॉ .मुकेश पाण्डेय द्वारा रचित हिंदी महाकाव्य

भक्ति करना राम की,    नहीं कायर का काम 
शीश उतारी जो हाथ धरे ,वहीँ ले हरि का नाम 

[1] चलते हैं लाखों लोग यहाँ पर ,कुछ ही मंज़िल पाते हैं
      इसलिए नहीं की राह कठिन इसलिए की रुक-रुक जाते हैं 
    मृत्यु से मत होना ग़ाफ़िल ,ज़िन्दगी इलहाम 

[२]  ज्ञानी से संगत कर लेना ,कुछ दूर तुम्हें ले जाएगा 
      कुछ दूर शास्त्र ले जाएंगे ,कुछ दूर गुरु पहुंचाएगा 
     आगे पथ अनजाना होगा ,मत करना विश्राम 

[३]  अपने जीवन की फ़िक्र करो ,परहित का तब ही ज़िक्र करो 
       ख़ुद गया नहीं जो मधुशाला ,भर पायेगा किसका प्याला 
     हो हृदय प्रेम से शून्य अगर ,तो मत करना प्रणाम 

[४] बहुजन हिताय बहुजन सुखाय माना यह मन्त्र क़ीमती है 
     स्वांत सुखाय जो जी न सका ,ज़िन्दगी न उसपर रीझती है 
   पहले ख़ुद ग़ज़ल बन जा ,फिर दे अपना तान 
क्रमशः......................................... 


        

बुधवार, 23 सितंबर 2015

सईयां दिहलें रात जगाई - डॉ मुकेश पाण्डेय

रात भर खुसुर फुसुर करत भईल विहान 
फूल दाढ़ी पर अधखिलल बा 
शाइत तबे पत्तई हिलल बा 
अब लगताटे जम्हाई 
सईयां दिहलें रात जगाई 
अब आवताटे ओंघाइ 

चढ़ल जवानी में आईल बा जहिया से ई सावन ,तेज भईल बा धड़कन 
सईयां के नेह बरसता खूब बरखा नियन झन झन ,भींजत बाटे तन-मन 
मस्ती में मन मस्ताना बा 
दिल उनके पर दीवाना बा 
छोड़े नाहीं कबहुँ कलाई 
सईयां दिहलें रात जगाई 
अब आवताटे ओंघाइ 

रही रही अंगड़ाई आवे टुटेला हमरो बदनवा पागल भईल बा मनवा 
अँखिया मोरी बंद हो जाय माजत में बरतनवा ,दुःख नाही बुझे सजनवा 
कुछ बोलस नाहीं मुद्दा हो 
पिया दे तारें कवन सजा हो 
दूजे बहे पवन पुरवाई 
सईयां दिहलें रात जगाई 
अब आवताटे ओंघाइ 

जइसे सावन टपके ओईसे हमरी जवनिया टपके ,हम बानी सबसे हटके 
बेरी-बेरी सजना के मन हमरी ओरिया लपके उनकर पलक ना झपके 
कुछ करस त मर्जी उनकर 
चित भी उनकर पट भी उनकर 
मोर दिहलें कमर लचकाई 
सईयां दिहलें रात जगाई 
अब आवताटे ओंघाइ 

























सोमवार, 21 सितंबर 2015

Producer Director sheel Singhal in recording Studio

Tabla Player Gaurav 

Sheel Singhal /Suman Ji/Dr.Mukes pandey 

sheel singhal

sheel singhal

dholak player ravi ji 

dholak player ravi ji

producer sheel singhal
music director suman ji 

sheel singhal

sheel singhal

Dr.mukesh Pandey & dholak player Ravi ji

dr.mukesh pandey and dholak player ravi ji

music director su
man ji
sheel singhal & suman ji

Dr.Mukesh Pandey /Sheel Singhal /suman ji

sheel singhal / suman ji 

suman ji /sheel singhal

sheel singal /suman ji

mukesh pandey /sheel singhal

mukesh pandey / sheel singhal

sheel singhal /suman ji

sheel singhal /suman ji 

sheel singhal /suman ji

ravi ji

ravi ji

gaurav

singer sukhlal andhi
sukhlal andhi/mukesh pandey

sheel singhal

sheel singhal/babloo/suman ji/sukhlal andhi

sheel singhal /suman ji/babloo/sukhlal andhi

sheel singhal/suman ji/sukhlal andhi 

sheel singhal/suman ji/mukesh pandey

mukesh pandey



mukesh pandey/sukhlal andhi

mukesh pandey/sukhlal andhi 

mukesh pandey /sukhlal andhi

mukesh pandey/sukhlal andhi 

sheel singhal/suman ji

sheel singhal / 

babloo bawal


sheel singhal



पी ले ले बानी मुंह महकता - डॉ मुकेश पाण्डेय

पी  ले ले बानी मुंह महकता 
राउर मिजाज बड़ी बहकता 
तनियो सा दुखाई त हम करे लागब हाला जीजा 
ओतने लगाईं जेतना दिदिया में जाला जीजा 

अबहीं बानी कमशीन उमर कम बावे जी 
रउरा खेला से लागत शरम बावे जी 
झकझूमर कईला से चुनकल हमार बाला जीजा 
ओतने लगाईं जेतना दिदिया में जाला जीजा 


आज का जाने काहे हमरा डर लागता 
राउर नियत आज हमरा गड़बड़ लागता 
मन करे मार दिहीं लहंगा में ताला जीजा 
ओतने लगाईं जेतना दिदिया में जाला जीजा 


जीजा पाण्डेय मुकेश खेला जनि नाधी जी 
हमके कोरा में अइसे रउरा जनि बांधी जी 
डांटे लागी दीदी देखी जांघ तर के छाला जीजा 
ओतने लगाईं जेतना दिदिया में जाला जीजा 


प्यार किसी से क्यों होता है - डॉ मुकेश पाण्डेय

बुझे दीयों के नाम हो गए 
उजियाले बदनाम हो गए 
चिड़ियों की नन्ही चोंचों पर 
चोरी के इलज़ाम हो गए 

होती है जो भी बातें शबाब में वो अब बात नहीं 
भींगा ये खेत है ओस से सारा अब बरसात नहीं 
प्यार किसी से क्यों होता है 
दिल जो गया तो क्यों रोता है 
जिसे ढालूँ ग़ज़ल में वो ज़ज़्बात अब नहीं 
जिस्म के साथ रूह की यारा सौग़ात अब नहीं 
ढाई आख़र पढ़ा न कोई 
सौ-सौ पूर्ण विराम हो गए 


हँसना हंसाना ये दिल फ़रेबी अब खुराफ़ात नहीं 
दुनिया में जो भी सांसे मिली है वो ख़ैरात नहीं 
रंग यूँ भी बदलते देखे हैं 
मैंने पत्थर पिघलते देखे हैं 
ये हक़ीकत है या दिल को बहला रहा है 
मैंने सुना है ज़मी पर ख़ुदा आ रहा है 
किसके आगे हाथ पसारें 
ईश्वर तक कंगाल हो गए 

शनिवार, 19 सितंबर 2015

प्यार के ईहे त ,ह पहिला शुरुआत - डॉ मुकेश पाण्डेय

नैना लड़ी दुनो दिलवा के हो जाई मुलाक़ात 
प्यार के ईहे त ,ह पहिला शुरुआत 

प्रीत के अगिया जब-जब दहकी 
तब-तब मनवा अपने से बहकी 
प्यार के गीत दिल तब गुनगुनाई 
दिल के मौसम फेर बहुते सोहाई 
केहु ना जाने सबका सोझा अँखिया करे लागी बात 
प्यार के ईहे त ,ह पहिला शुरुआत 

मन में पहिले त आस भर जाई 
फेर तनी सा विस्वास भर जाई 
देंहिया सिहरी ना आई ऊँघाई 
प्रीतम के देखि दिल फूले ना समाई 
चुपे चोरी फेर मिले ख़ातिर खोजी अन्हरिया रात 
प्यार के ईहे त ,ह पहिला शुरुआत 

सब एगो मधुर सपन होई जाई 
भावना भी सुमन होई जाई 
प्यार ना देखी तब गोर बाउर चिकन 
मन मंदिर में जे बसे उ निमन 
ई ह आज़ाद पंक्षी मुकेश " एकर ना कवनो जात 
प्यार के ईहे त ,ह पहिला शुरुआत 















शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

ए गोरिया चल ना ,चल नदिया के पार - डॉ मुकेश पाण्डेय

खेत खरिहान में -सगरो सीवान में फ़हरेला अंचरा तोहार 
ए गोरिया चल ना ,चल नदिया के पार 

नदी के पार गोरी हमरो पलानी 
हवे पिरितिया के उहे निशानी 
घर बनइनि हम आन्ही से पूछ के 
बहेला हवा हमरा खिड़की से पूछ के 
चाँद के चंदनिया -शीतला के निंदिया नदिया करेले जुन्हार 
ए गोरिया चल ना ,चल नदिया के पार 

गलिया प तोहरो सुरुज के ललाई 
हमरो पलनिया अंजोर होई जाई 
फूल के छुईह तू तितली से पूछ के 
आवे अन्हार उँहा बिजली से पूछ के 
सुखला जवरवा में हहरत आषाढ़ में बन रसबुनिया के धार 
ए गोरिया चल ना ,चल नदिया के पार 

अंग अंग तहरो भरल सुघराई 
ऐना में तहरो ना रुपवा समाई 
उठिह भोरे अंगड़ाई से पूछ के 
देखिह शीशा परछाई से पूछ के 
अँखिया फ़रक जाई दर्पण दरक जाई 
जब होई सोरहो सिंगार 
ए गोरिया चल ना ,चल नदिया के पार 















रोंवा रोंवा डहका देहब - डॉ मुकेश पाण्डेय

हमरा के छोड़ी जदी बहरा तू जईब रोंवा रोंवा डहका  देहब 
बाटे लड़कपन करके छिनरपन आपन काम चला लेहब 

जब दिल के दिल जान लिही ,सबका के आपन मान लिही 
बुरबक लेखा ना राजा जी ,देहिया अकील से काम लिही 
इंद्रधनुषी ये तन के पहेली दोसरा से सुलझा लेहब 

पड़े ना तनिको फ़रक पिया ,तहरा उपस्थित रहला से 
जोबन में घर अब बांबे करी तहरा चहला ना चहला से 
तज के लाज लाँघ संकोच सब मर्यादा गिरा देहब 

मछरी काई साँप घोंघा उहें रही जहाँ झील बा 
सारा पड़ोस में चर्चा बाटे हमरा कहाँ पर तिल बा 
अनगिनत अनलिखल पन्ना पर दोसर ज़िल्द चढ़ा लेहब 

जाड़ा जाला ना ओढ़ला से रजाई - डॉ मुकेश पाण्डेय

आईं आईं आईं सईयां जी जल्दी से घरवा आईं 
कि जाड़ा जाला  ना ओढ़ला से रजाई 

मनवा ना लागे हमार खटिया पर 
जागल रहिले हम रतिया भर 
कवन ई दे तानी हमरा के साजा 
हो जाता सब किरकिरा ई माजा 
केकरा से दिल के कहीं हम बतिया,केकरा  से बतिआईं 
कि जाड़ा जाला  ना ओढ़ला से रजाई 

ई कवनो चाल ना हवे हो प्यार में 
आधा बीतल जाड़ बा इन्तिज़ार में 
भईल बा सब जगे ईहे रे हाला 
गेहूं के संगे संगे घुनों पिसाला 
माटी के तन पर गुमान बाटे काथी के अतने रउरा बताईं 
कि जाड़ा जाला  ना ओढ़ला से रजाई 

पहिले तू कहि देत ना अईब घरे 
हमहुँ त  रह जइतीं राजा नइहरे 
बहरी रहब जे अईब अंदर 
सब प्यार हो जाई राजा छू-मंतर 
अईब ना जदी त मिली ना नदी प्यासे मन रही जाई 
कि जाड़ा जाला  ना ओढ़ला से रजाई 
















गुरुवार, 17 सितंबर 2015

रफ़्ता -रफ़्ता रूख़ ये हवा का बता देगा- डॉ मुकेश पाण्डेय

रफ़्ता -रफ़्ता रूख़  ये हवा का बता देगा 
मेरे वास्ते इतना है बहुत 
 हमने तुझे चाहा है बहुत 
तोहे मिल जाये इसकी ख़बरिया 
मोहे लागी रे जुल्मी नज़रिया 
मैं गीर - गीर जाऊं सँवरिया 


जबसे लागे ये मेरे नैन -जियरा का चैन भागे 
तबसे ये नैना लागे 
बहके-बहके हैं मेरे चाल -अबसे जो है ये हाल 
जाने क्या होगा आगे 
मेरी आँखों को है धोखा बहुत 
ज़ख्मो का है अंदाज़ा  बहुत 
उफ्फ़ !मैं कैसी पगली बावरिया 
मो पे डालो ना ऐसे नज़रिया 
मैं गीर गीर जाऊं सँवरिया 


देखो आई है ये बहार ,उसपे तेरा ये प्यार 
कैसे जिया मैं सम्हालूँ 
लाखो में है तू एक पर, ऐसे मुझे ना देख 
आँचल में नैना छुपालूं 
मैं अपनी राय को झुठलाऊं 
और क्या से क्या मैं हो जाऊं 
मुझे खुद भी ना होवे ख़बरिया 
हाय !देखे ये सारी नज़रिया 
मैं गीर-गीर जाऊँ सँवरिया 


तेरा मेरा है जो ये मेल -कई सदियों का खेल 
तू काया मैं तेरी छाया 
तू इन बहारों का है फूल -मुझको ना जाना भूल 
आई हूँ  जब भी बुलाया 
दर्द देने में किफ़ायत कर 
रो दूँ अगर तो हिदायत कर 
इक प्यासी हुई मैं बदरिया 
मोहे लागी रे ज़ुल्मी नज़रिया 
मैं गीर-गीर जाऊं सँवरिया 





















डॉ मुकेश पाण्डेय के भोजपुरी में बाल कविता

ठीक समय पर सुबह-सवेरे 
आ जानी हम रोज    स्कुल 
हर दिन आपन काम करीले 
कबो   करीं   ना  एइमे  भूल 
सब लईकन से  प्रेम  करीले 
इहे   एगो        मोर   उसूल 
अच्छा बच्चा कहे लोग हमके 
हम हईं सबके  आँख के फूल 
हम  मुकेश'के कविता पढ़ के 
रहेनी सबका  से  मिल -जुल 

जवन चाहतारे तेहूँ कर जो रे - भोजपुरी लोकगीत - डॉ मुकेश पाण्डेय

जवन चाहतारे तेहूँ कर जो रे 
ना त डूबी धँसी कहीं मर जो रे 
रुपिया पईसा मँगबे भउजी केहु दे दी पईंचा 
कवन गुजरी दिही रे भतार तोहके पईंचा 

ई कवन लुफत सिखले रे सतभतरी 
छुईयो के लाज ना हाया बाटे कवनो गतरी 
कुल के इज़्ज़त बुझतारे गजरा मुरई ढईंचा 

कहले त कहले दोसरा से जनि कहिहे 
ना त लात मुक्का दोसरा से तेहीं सहीहे 
खईहे ते मुअड़ी के मार हईंचा -हईंचा 

एही ख़ातिर  भेजले भतार का तें बहरा 
तोहपे 'पाण्डेय मुकेश 'से लगवाईब पहरा 
उहे तोर हरिहर रखिहें बाग़ आ बगइचा 

बुधवार, 16 सितंबर 2015

प्यार करके प्रेमी दग़ा देले बाड़े -डॉ मुकेश पाण्डेय

शेर : दिल में दाग़ लगइलें गइलें छोड़ी के हमार साथ हो 
       जान हथेली पर रख देनी मनलेन नाहीं बात हो 


प्यार करके प्रेमी दग़ा देले बाड़े 
दिल दोसरा से लगा लेले बाड़े 

संघे जिए मरे के खइले रहन किरिया 
आज काहे छोड़लेन फिकिरिया 
ग़लती का कईनी हम सज़ा देले बाड़े 

उनका के मनले रहनी दिलवा के सईयाँ 
पल भर में बनलें कसईया 
हम भईनी बासी ऊ ताजा भईल बाड़े 

सोची-सोची लागे नाहीं भुखिया पिअसिया 
आख़िर सुनाईं केतना बतिया 
मुकेश दिल से अपना हटा देले बाड़े 

हरितालिका तीज गीत : डॉ मुकेश पाण्डेय

केहु साजन के अपना इंतज़ार करता 
मेहँदी हाथ में लगाके तन सिंगार करता 

हरी हरी चूड़ियाँ त  हरिहर साडी 
तीज परब के बाटे फूल तईयारी 
धरती भी हरिहर रंगा गईल बाड़ी 
हर दुल्हिनियां सुनर लागतारी 
केहु नयनन में काजर के धार करता 

झूला प झूले गोरी कजरी के तान पर 
मन के चिरईया आज बिया उड़ान पर 
जेकरा रहाला ना आज उहो उपवास बा 
अपना व्रत प ओके पूरा विस्वास बा 
केहु आरती के थाल तईयार करता 

पाण्डेय मुकेश'केतना निमन  लागताटे 
हिन्दू धरम के ई बड़ परब बाटे 
हरितालिका के कथा कहतारें पंडित जी 
पूरा परिवार संघे-संघे सुनताटे 
केहु सईयां के अपना दीदार करता 

भोजपुरी ग़ज़ल[3] : डॉ मुकेश पाण्डेय

उ सितमगर बा आ हम बानी 
दुःख के शहर बा आ हम बानी 

तमन्ना बा ना कवनो आरज़ू बा 
टूटल जिगर बा आ हम बानी 

अन्हरिया रात में पुरपेंच मंज़िल 
कठिन डगर बा आ हम बानी 

बनी का ख़ाक बिगड़ी का मुक्द्द्ऱ 
दुआ ई बे-असर बा आ हम बानी 

Latest Punjabi Song Honda Wala Yaar - INDYA RECORDS

हरितालिका तीज ब्रत - डॉ मुकेश पाण्डेय

सब मिलजुल के आरती कर हरितालिका तीज ब्रत के 
सब मिल जुल के आरती उतार शिव सती के प्रेम सत के 

थाल सजाई के ज्योत जगाईके 
जय-जय आरती गीत गाईके 
सब मिलजुल के आरती कर हरितालिका तीज ब्रत के 

दुनिया में अइसन ना मिले निशानी 
सखिया हरण के ई प्रेम कहानी 
सब मिलजुल के आरती कर हरितालिका तीज ब्रत के 

घरवा दुवरवा खुशहाली बरसे 
रहे सुहागिन मनवा हरषे 
सब मिलजुल के आरती कर हरितालिका तीज ब्रत के 


ई तीज व्रत हम मनाईं सारी जिनगी 
पाण्डेय मुकेश 'ई अरज सारी जिनगी 
सब मिलजुल के आरती कर हरितालिका तीज ब्रत के 

भोजपुरी ग़ज़ल [2] : डॉ मुकेश पाण्डेय

ई फाटल करेजा सियल जाई कईसे 
दरद लेके दिल में जियल जाई कईसे 

पिरितिया के अमरित मिली आस रहे 
ज़हर दिहल उनकर पियल जाई कईसे 

अगर भेंट होई अकेला में उनसे 
मगर पहिले अइसन मिलल जाई कईसे 

जीवन के चमन में  पतझड़  समाईल 
अब फूल अइसन खिलल जाई कइसे 

मुहब्बत के मारल चेतवले रहन जा 
जवाब आख़िर उनके दिहल जाई कईसे  

भोजपुरी ग़ज़ल : डॉ मुकेश पाण्डेय

जेकर क़िस्मत पीड़ा लिखलस 
उहे जवाब में कविता लिखलस 

मायावी मृगजल झूठहीं 
बालू पर आशा लिखलस 

फुलवन के क्षणभंगुरता पर 
कुहासा क्षणिका लिखलस 

बून्द एगो लोर के अनगिन 
दुःख के परिभाषा लिखलस 

पीरा ना मालूम केतना ले 
कालजई गाथा लिखलस 

मंगलवार, 15 सितंबर 2015

जनि जाईं ओने ऊ गली बदनाम बा - डॉ मुकेश पाण्डेय

जनि जाईं ओने ऊ गली बदनाम बा 
गछिया पोखरिया हर कली बदनाम बा 

ओने एगो कोठा ऊपर नाचेले नचनिया 
पईसा लेई बनेले ऊ रात भर के कनिया 
लोर पी के हँसे ऊ पगली बदनाम बा 

एके बा परिचय उँहा माई बहिन बेटी 
एक दूसरा के सोझा जाला सभे लेटी 
ओ गोदिया में जे भी पली बदनाम 

जवने भी होला उँहा होखे सब रात के 
काश केहु खोजित इतिहास ये श्राप के 
काहे उँहा जिनगी अतना भली बदनाम बा 

केतना जतन से पिरितिया संवरनी - डॉ मुकेश पाण्डेय

केतना जतन से पिरितिया संवरनी 
सनेहिया हो टूटी गईले  अचके हमार 

मनवा के बतिया अंटकी गईले ओठवा 
सनेहिया हो दरद मिलल बेशुमार 

जिनगी के मरम समझ में न आवेला 
जेतने समझिले ओतने अझुराला 

अनबुझ जिनगी के अनबुझ बतिया 
सनेहिया हो टूटी गईले अचके हमार 

कागा उचार पिया अइहें कि ना रे [भोजपुरी गीत ] डॉ मुकेश पाण्डेय

कागा उचार पिया अइहें कि ना रे 
ठोकी ठोकी हमरा के सुतइहे कि ना रे 

हमरो बलम के अरब के नोकरिया 
लेबो ना कइलें उ खोजिया ख़बरिया 
पटना के टिकट कटइहें कि  ना रे 

सहलो ना जाला सजन के जुदाई 
केतना दरद होला कईसे बताईं 
नेहिया के कथवा सुनइहें कि ना रे 

सरसो के फूल लेखा देंह पियराता 
दिनवा गिनत गिनत अंगूरी खियाता 
पतझड़ बसंत बनइहें कि ना रे 


जाईं जाईं हम जान गईनी [भोजपुरी ग़ज़ल ] डॉ मुकेश पाण्डेय

जाईं जाईं  हम जान गईनी 
रउरा का चीज़ हईं पहिचान गईनी 

तबहुँ जीयतानी ई अजीब बात बा 
रउरा कबसे लेके हमार जान गइनी 

रउरा आईल रहनी जहिया हमरा घरे 
हमार ओहि दिन से लेके ईमान गईनी 

जवना जगहा सुरुज भी पहुँच ना सकस 
मुकेश पाण्डेय' हम होके इंसान गईनी 

आधा जिनगी मरे मारे में गुजरी [भोजपुरी ग़ज़ल ] डॉ मुकेश पाण्डेय

आधा जिनगी मरे मारे में गुजरी 
बकिया परलोक सुधारे में गुजरी 

बाप मतारी लईका फईका धरम करम 
सगरो उमिर क़र्ज़ उतारे में गुजरी 

दू क़दम के साथ देके चल  जइब तू 
बक़िया राह तोहके बिसारे में गुजरी 

रात भर झरी ईयाद के पतई 
दुपहरिया ले आँगन बहारे में गुजरी